Tuesday, 9 September 2014

FOR & AGAINST




क्यों इस दिल को किसी की तालाश होती है … 
क्यों इस दिल को किसी की आस होती है ,
उस चाँद को देखो वो भी तो कितना तन्हा है … 
जबकि हर रोज चांदनी  से उसकी मुलाकात होती है।। 




इस दिल को किसी की भी तलाश नहीं होती है … 
ना ही इस दिल को किसी की आस होती है ,
अगर कोई कहे कि चाँद कितना तन्हा है … 
तो मैं नहीं मानती उस चाँद की तन्हाई को … 
क्योंकि चांदनी तो हर वक़्त उसके साथ होती है।। 

No comments:

Post a Comment